प्रतुल शाहदेव ने कहा कि आज़ादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री के चयन की प्रक्रिया ही कांग्रेस की वोट-चोरी मानसिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्षों के मतदान में सरदार वल्लभभाई पटेल को 28 वोट और जवाहरलाल नेहरू को मात्र 2 वोट मिले थे, इसके बावजूद लोकतांत्रिक निर्णय को दरकिनार कर नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। इसे उन्होंने जनमत की खुली अवहेलना बताया।
उन्होंने आगे कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित किया जाना भी कांग्रेस के इतिहास में लोकतांत्रिक मूल्यों के उल्लंघन का बड़ा उदाहरण है। न्यायालय ने चुनाव नियमों के अनुरूप न होने के आधार पर यह फैसला दिया था। इसके बाद वर्ष 1975 में लगाया गया आपातकाल लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था, जब 1976 में होने वाले आम चुनाव में जनता के मतदान के संवैधानिक अधिकार को छीन लिया गया।
प्रतुल शाहदेव ने यह भी आरोप लगाया कि सोनिया गांधी का नागरिक बने बिना मतदाता सूची में नाम दर्ज होना भी वोट चोरी का उदाहरण है, जिसे कांग्रेस ने सत्ता के प्रभाव से दबाने का प्रयास किया।
ईवीएम को लेकर विपक्ष के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि यदि ईवीएम में वास्तव में खोट होती, तो 2014 के बाद हुए 74 विधानसभा चुनावों में विपक्ष 30 चुनाव कैसे जीत पाया। उन्होंने बताया कि इनमें से 44 चुनाव एनडीए ने और 30 चुनाव विपक्ष ने जीते। इससे स्पष्ट है कि विपक्ष हारने पर बहाने तलाशता है और जीतने पर चुप्पी साध लेता है।
प्रतुल शाहदेव ने कहा कि कांग्रेस को लोकतंत्र पर सवाल उठाने से पहले अपने इतिहास पर आत्ममंथन करना चाहिए, क्योंकि देश की जनता अब सच्चाई समझ चुकी है और बार-बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाजपा पर भरोसा जता रही है।









