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डेढ़ सौ साल से जल रही आस्था की ज्योति, तीन पीढ़ियों ने सहेजी बभनगामा की काली पूजा की परंपरा

चार आने और सोलह आने के चंदे से सजता था पूजा का आयोजन, बांस-तिरपाल के नीचे होती थी मां काली की आराधना जात्रा से गांव की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई ऊंचाई, दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी नेताजी नाट्य समिति बभनगामा स्वर्गीय खुदीराम दत्ता के योगदान और गांव की सांस्कृतिक विरासत

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डेढ़ सौ साल से जल रही आस्था की ज्योति, तीन पीढ़ियों ने सहेजी बभनगामा की काली पूजा की परंपरा

चार आने और सोलह आने के चंदे से सजता था पूजा का आयोजन, बांस-तिरपाल के नीचे होती थी मां काली की आराधना जात्रा से गांव की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई ऊंचाई, दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी नेताजी नाट्य समिति बभनगामा स्वर्गीय खुदीराम दत्ता के योगदान और गांव की सांस्कृतिक विरासत को आज भी याद कर रही नई पीढ़ी संथाल हूल एक्सप्रेस संवाददाता जितेन्द्र सेन तीनपहाड़। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, पूजा का स्वरूप बदला और संसाधनों में भी काफी बदलाव आया, लेकिन बभनगामा गांव में मां काली के प्रति लोगों की आस्था आज भी कायम है। लगभग डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही काली पूजा की परंपरा गांव के धार्मिक इतिहास के साथ-साथ सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की भी पहचान बनी हुई है। कभी बांस और प्लास्टिक के तिरपाल के सहारे पूजा