संथाल हूल एक्सप्रेस (हिंदी दैनिक)
भारत के सामाजिक और शैक्षिक आंदोलन के इतिहास में महात्मा ज्योतिराव (ज्योतिबा) फुले वह नाम है जिसने समाज को रूढ़ियों और विषमताओं से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। अत्याचार और भेदभाव से जकड़े उस दौर में उन्होंने समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष की नई राह प्रशस्त की। फुले न केवल एक समाज सुधारक थे, बल्कि वे भारत में आधुनिक विचारधारा और मानवाधिकार के सबसे प्रखर चेहरों में से एक रहे।
शिक्षा को जनता तक पहुँचाने का अभियान
ज्योतिबा फुले ने भारतीय समाज में शिक्षा के महत्व को सबसे पहले समझा और उसे जाति-वर्ग से ऊपर उठाकर आम जनता तक पहुँचाने की मुहिम शुरू की। 1848 में उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय खोला, जब स्त्री-शिक्षा को पाप माना जाता था। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। यह कार्य उस समय की सामाजिक धारणाओं को सीधी चुनौती थी—और आगे चलकर इसी ने महिलाओं के अधिकारों और समानता की मजबूत जमीन तैयार की।
जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष
फुले ने जीवन भर अछूतों, दलितों और समाज के कमजोर वर्गों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने ब्राह्मणवादी ऊँच-नीच को खुलकर चुनौती दी। उनके लेखन, भाषण और संस्था—सत्यशोधक समाज—ने जातिगत उत्पीड़न को समाप्त करने और समान समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किसान और श्रम आधारित समाज की वकालत
किसानों की आर्थिक बदहाली और शोषण फुले की चिंता का बड़ा विषय था। उनका मानना था कि भारत की वास्तविक रीढ़ किसान हैं और उनकी समस्याओं को समझे बिना राष्ट्र का विकास संभव नहीं। अपने ग्रंथों में उन्होंने भूमि-सुधार, श्रमिक अधिकारों और आत्मनिर्भरता की अवधारणा प्रस्तुत की।
स्त्री-सशक्तिकरण के अग्रणी
महात्मा फुले उन पहले भारतीयों में से थे जिन्होंने स्त्री सम्मान को सामाजिक परिवर्तन का मूल आधार माना। विधवा पुनर्विवाह, सती प्रथा, बाल विवाह और स्त्री-शिक्षा जैसे मुद्दों पर उन्होंने पुरज़ोर आवाज़ उठाई। उनकी विचारधारा ने आधुनिक भारत की नारी चेतना को नई दिशा दी।
आज भी उतने ही प्रासंगिक
ज्योतिबा फुले ने एक ऐसे भारत की परिकल्पना की जो समानता, ज्ञान और मानवीय मूल्यों पर टिका हो। आज जब समाज विविध चुनौतियों का सामना कर रहा है, फुले का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो उठता है—
“शिक्षा ही सच्ची मुक्ति की कुंजी है।”
ज्योतिबा फुले सिर्फ इतिहास की महत्त्वपूर्ण शख्सियत नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक प्रेरणा हैं। उनका योगदान भारतीय समाज को न्याय और मानवता की ओर ले जाने वाली विरासत के रूप में आज भी जीवंत है।









