संथाल हूल एक्सप्रेस (हिंदी दैनिक)।
विश्व के कई देशों में मनाया जाने वाला ‘थैंक्सगिविंग डे’ सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि मानवता, कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने की परंपरा का प्रतीक है। यह दिवस उन सभी लोगों, संबंधों और प्रकृति के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का अवसर देता है, जिन्होंने जीवन में सकारात्मक योगदान दिया है। अमेरिका और कनाडा सहित कई देशों में यह पर्व सदियों से सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मनाया जा रहा है।
थैंक्सगिविंग डे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह परिवार और समाज को साथ बाँधने वाला पर्व है। लोग इस दिन अपने परिजनों और मित्रों के साथ भोजन करते हैं, सुख-दुःख साझा करते हैं और ईश्वर तथा प्रकृति का आभार प्रकट करते हैं। भोजन, दान और मिलन कार्यक्रमों के माध्यम से यह त्योहार सामाजिक सामंजस्य और मानवीय रिश्तों को मजबूत करता है।
इतिहासकार बताते हैं कि इस पर्व की शुरुआत अमेरिका के मूल निवासियों द्वारा की गई थी, जहां अच्छी फसल और प्रकृति के वरदान के लिए ईश्वर को धन्यवाद कहा जाता था। समय के साथ यह एक वैश्विक सांस्कृतिक पर्व बन गया। आज भी लोग इस दिन जरूरतमंदों की सहायता, भोजन वितरण, और परोपकार के कार्य करके परंपरा को जीवित रखते हैं।
भारत सहित कई देशों में भी आज यह त्योहार सकारात्मक संदेश के साथ मनाया जाने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक जीवन की व्यस्तता में थैंक्सगिविंग डे लोगों को रुककर जीवन की अच्छाइयों को महसूस करने और हर छोटे-बड़े योगदान के प्रति कृतज्ञ रहने की प्रेरणा देता है।
समाज-शास्त्रियों का मानना है कि जब दुनिया भौतिकता और गतिशीलता की ओर बढ़ रही है, ऐसे में आभार और संवेदनशीलता का भाव किसी भी सभ्य समाज के लिए अनिवार्य हो जाता है। यही इस त्योहार का मूल संदेश है—धन्यवाद, साझेदारी और आपसी सम्मान।
थैंक्सगिविंग डे हमें यह याद दिलाता है कि मानवता की सबसे बड़ी शक्ति आभार और प्रेम है, और यही भाव समाज को बेहतर बनाने की दिशा में सबसे मजबूत कदम साबित हो सकता है।









