सुप्रीम कोर्ट में SIR को लेकर सख़्त सवाल, नियमों पर उठी संवैधानिक बहस

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संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क।

सुप्रीम कोर्ट में विशेष सुधार अभियान (SIR) से जुड़ी प्रक्रिया पर गुरुवार को विस्तृत सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों ने चुनाव आयोग की उस व्यवस्था पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसके तहत SIR केवल फोटो वेरिफिकेशन तक सीमित न रहकर नागरिकता जांच के रूप में परिवर्तित हो गया है। अदालत में यह तर्क रखा गया कि चुनाव आयोग के पास ऐसी जांच का कोई संवैधानिक या विधिक अधिकार नहीं है।

वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि SIR की प्रक्रिया अब नागरिकता तय करने का माध्यम बनती दिखाई दे रही है, जबकि भारतीय कानून में यह अधिकार किसी दूसरे प्रावधान को भी प्राप्त नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि इस व्यवस्था के तहत एक व्यक्ति को स्वयं यह साबित करना पड़ता है कि वह विदेशी नहीं है। उनके अनुसार यह नियम विदेशी अधिनियम जैसी प्रक्रिया का स्वरूप ले चुका है, जिसमें प्रमाण burden व्यक्ति पर ही आ जाता है।

वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी चुनाव आयोग की शक्तियों पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि BLO को इतनी बड़ी शक्तियाँ देने का औचित्य स्पष्ट नहीं है। उनका कहना था कि मतदाता सूची संशोधन के नाम पर किसी की नागरिकता पर संदेह या निर्णय लेना न केवल अनुचित है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनते हुए पूरे मामले पर विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची से जुड़ी किसी भी प्रक्रिया को संविधान और कानून की सीमाओं में रहकर ही लागू किया जा सकता है। इस मामले में अगली सुनवाई आगामी तिथि पर निर्धारित की जाएगी।

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