वीरता और समर्पण की अद्वितीय प्रतिमूर्ति: झलकारी बाई की जयंती पर शत-शत नमन

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संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसी वीरांगनाएँ हुई हैं, जिनके साहस, राष्ट्रभक्ति और बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया है। ऐसी ही एक महान वीरांगना थीं— झलकारी बाई, जिनकी जन्मजयंती पर आज पूरा देश कृतज्ञता और सम्मान के साथ उन्हें याद कर रहा है।

झलकारी बाई का नाम रानी लक्ष्मीबाई की सेना के दुर्गा दल में सेनापति के रूप में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनमें असाधारण शौर्य, युद्धकला और नेतृत्व क्षमता थी। घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और निशानेबाज़ी में वे बचपन से ही निपुण थीं, जो आगे चलकर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण योद्धा के रूप में स्थापित करती है।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई की सेना का सबसे बड़ा सहारा झलकारी बाई ही थीं। उनकी सबसे उल्लेखनीय भूमिका उस समय सामने आई जब अंग्रेजी सेना ने झांसी को चारों ओर से घेर लिया था। अपने अद्भुत साहस और रानी लक्ष्मीबाई जैसी सूरत के कारण उन्होंने मोर्चा संभालते हुए अंग्रेजों को भ्रमित कर दिया, जिससे रानी को रणनीतिक रूप से निकलने का अवसर मिल सका।
इस बलिदान और साहस ने उन्हें इतिहास की अमर नायिका बना दिया।

झलकारी बाई केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि स्त्री-सशक्तिकरण का सशक्त प्रतीक भी हैं। उन्होंने दिखाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़ निश्चय, साहस और राष्ट्रप्रेम के दम पर असंभव को संभव किया जा सकता है। आज भी उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और नेतृत्व की प्रेरणा देता है।

उनकी जयंती पर उन्हें याद करना भारत की उन महान संतानों को सम्मान देना है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। झलकारी बाई का अदम्य साहस सदियों तक भारतीय समाज को प्रेरित करता रहेगा।

संथाल हूल एक्सप्रेस की पूरी टीम झलकारी बाई की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन करती है।

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