दिल्ली: दो दशक में दहल चुकी है राजधानी, 1997 से 2025 तक 10 बड़े धमाकों ने छोड़ी दहशत की लकीर

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संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क

नई दिल्ली, 13 नवम्बर :
देश की राजधानी दिल्ली, जो लोकतंत्र का दिल मानी जाती है, पिछले दो दशकों में बार-बार आतंकियों के निशाने पर रही है। 1997 के लाजपत नगर ब्लास्ट से लेकर 2025 के लाल किला विस्फोट तक, दिल्ली ने आतंक की वह विभीषिका झेली है जिसने न केवल लोगों की जानें लीं, बल्कि सुरक्षा तंत्र को भी झकझोर कर रख दिया। हर दशक में हुए इन धमाकों ने इस बात को साबित किया है कि भारत की राजधानी हमेशा आतंकी संगठनों की निगाह में रही है।

1997: लाजपत नगर ब्लास्ट – दहशत की पहली दस्तक

21 मई 1997 की शाम दक्षिण दिल्ली के व्यस्ततम इलाके लाजपत नगर मार्केट में हुए कार बम विस्फोट ने राजधानी को पहली बार झकझोर दिया। इस धमाके में 13 लोगों की मौत हुई और 30 से अधिक घायल हुए। विस्फोट इतना भीषण था कि आसपास की कई दुकानों और गाड़ियों में आग लग गई। बाद में जांच में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का नाम सामने आया।

1998: करोल बाग गैफिटी मार्केट ब्लास्ट – कारोबार के बीच तबाही

1998 में करोल बाग के गैफिटी मार्केट में विस्फोट हुआ जिसमें 17 से अधिक लोगों की मौत हुई। यह धमाका त्योहारों के सीजन में हुआ था, जब बाजार ग्राहकों से खचाखच भरा हुआ था। विस्फोट में इस्तेमाल आईईडी (IED) एक स्कूटर में लगाया गया था।

2001: संसद भवन पर हमला – लोकतंत्र पर सीधा वार

13 दिसंबर 2001 को देश की संसद भवन पर हमला हुआ, जिसे भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है। इस हमले में आतंकी गोलीबारी और विस्फोट लेकर संसद के भीतर घुसने की कोशिश कर रहे थे। 9 लोगों की मौत हुई, जिनमें सुरक्षा कर्मी और कर्मचारी शामिल थे। सभी पांच हमलावर मौके पर मार गिराए गए। यह हमला जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़ा पाया गया।

2005: दिल्ली सीरियल ब्लास्ट – त्योहारों के बीच खून-खराबा

29 अक्टूबर 2005, दीपावली से ठीक पहले दिल्ली में तीन जगह — सरोजिनी नगर, पहाड़गंज और गोविंदपुरी — पर सिलसिलेवार धमाके हुए। इन धमाकों में 60 से अधिक लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हुए। त्योहार की रौनक एक पल में मातम में बदल गई। जांच में लश्कर-ए-तैयबा के नेटवर्क का नाम आया।

2008: दिल्ली सीरियल ब्लास्ट – पांच जगहों पर दहशत

13 सितंबर 2008 को राजधानी एक बार फिर आतंकियों के निशाने पर आई। कनॉट प्लेस, करोल बाग, बाराखंबा रोड, इंडिया गेट और ग्रेटर कैलाश सहित पाँच जगहों पर बम विस्फोट किए गए। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई और 100 से अधिक घायल हुए। हमले की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली।

2008: मेहरौली ब्लास्ट – बच्चों के बीच मौत का खेल

उसी साल 27 सितंबर 2008 को दक्षिण दिल्ली के मेहरौली बाजार में एक और धमाका हुआ। दो बाइक सवार युवकों ने बम फेंका, जिसमें 2 लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए। यह हमला दिल्ली में लगातार दूसरे हफ्ते दहशत फैलाने वाला था।

2011: दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट – न्याय के मंदिर में आतंक

7 सितंबर 2011 की सुबह, दिल्ली हाई कोर्ट के गेट नंबर 5 के पास विस्फोट हुआ। यह वह जगह थी जहां रोजाना सैकड़ों लोग याचिका दाखिल करने और सुनवाई के लिए आते हैं। धमाके में 15 लोगों की मौत हुई और 70 से अधिक घायल हुए। जांच में आतंकी संगठन हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (HUJI) और बाद में लश्कर-ए-तैयबा के नाम सामने आए।

2021: इजरायली दूतावास के पास धमाका – कूटनीतिक इलाके में हलचल

29 जनवरी 2021 को दिल्ली के सबसे सुरक्षित क्षेत्र, इजरायली दूतावास के पास, एक मामूली धमाका हुआ। हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी। हमले के पीछे विदेशी एजेंसियों की साजिश की संभावना जताई गई थी।

2025: लाल किला ब्लास्ट – डॉक्टर आतंकियों की साजिश

नवंबर 2025 में दिल्ली एक बार फिर बम धमाके से दहल उठी। इस बार आतंकियों ने लाल किला परिसर के पास विस्फोट किया। जांच में सामने आया कि यह हमला किसी आत्मघाती हमलावर का नहीं, बल्कि “सफेदपोश आतंकी मॉड्यूल” का हिस्सा था। गिरफ्तार संदिग्धों में डॉक्टर और इंजीनियर शामिल हैं, जिनका संबंध जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से बताया गया। इस विस्फोट में 12 लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए।


लगातार सवालों के घेरे में सुरक्षा तंत्र

इन दो दशकों में दिल्ली में हुए धमाकों ने एक बात स्पष्ट की है कि राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था बार-बार आतंकियों की परीक्षा में विफल होती रही है। कई बार खुफिया एजेंसियों को हमले की पूर्व सूचना मिली, लेकिन हमले रोक नहीं पाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब आतंक का चेहरा बदल गया है — “गन और ग्रेनेड से लेकर साइबर और मेडिकल टेररिज्म” तक। 2025 का लाल किला ब्लास्ट इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ डॉक्टरों और शिक्षित युवाओं की भागीदारी ने नई चिंता पैदा कर दी है।

दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा —

“आतंक अब सीमाओं से नहीं, विचारधाराओं से फैल रहा है। हमें अब साइबर, सोशल और मनोवैज्ञानिक स्तर पर सुरक्षा को और मजबूत करना होगा।”


निष्कर्ष

1997 से लेकर 2025 तक की इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि दिल्ली सिर्फ भारत की राजधानी नहीं, बल्कि आतंक के निशाने पर एक प्रतीक बन चुकी है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह समय है कि वे न केवल प्रतिक्रिया दें, बल्कि रोकथाम की नई रणनीति तैयार करें — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ ‘दिल्ली ब्लास्ट’ जैसी सुर्खियाँ फिर कभी न पढ़ें।


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Bishwjit Tiwari
Author: Bishwjit Tiwari

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