कार्तिक पूर्णिमा: स्नान, दान और पुण्य का पावन पर्व

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संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क

हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसे ‘देव दीपावली’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त होने की खुशी में दीप प्रज्वलित कर उत्सव मनाया था। इसलिए इस पर्व को उजाला, पवित्रता और विजय का प्रतीक माना जाता है।

सुबह के समय पवित्र नदियों में स्नान और भगवान विष्णु, शिव तथा ब्रह्मा की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान-दान करने से सारे पाप नष्ट होते हैं तथा व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। झारखंड समेत पूरे देश में लोग इस दिन गंगा, सरयू, स्वर्णरेखा, बराकर, मायूराक्षी सहित विभिन्न नदियों एवं तालाबों पर जाकर श्रद्धापूर्वक स्नान करते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन तुलसी पूजन, दीपदान और गुरुओं का स्मरण भी किया जाता है। पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध किया था, इसी कारण इसे ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। वहीं, सिख समुदाय गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व के रूप में इसे अत्यंत हर्षोल्लास से मनाता है। गुरुद्वारों में कीर्तन, लंगर और प्रकाश उत्सव का आयोजन किया जाता है।

शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के धार्मिक स्थलों पर भारी भीड़ देखी जा रही है। श्रद्धालु सुबह से ही मंदिरों में पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा भी इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम, भंडारा एवं सेवा कार्य आयोजित किए जा रहे हैं।

कार्तिक पूर्णिमा का यह पावन पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि समाज में प्रकाश, शांति और सद्भाव फैलाने का प्रेरक संदेश भी देता है। श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा यह पवित्र त्योहार लोगों के जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता लेकर आए—इसी शुभकामना के साथ।

Bishwjit Tiwari
Author: Bishwjit Tiwari

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