मसला धर्म का नहीं है, मसला उस व्यवस्था का है जो वर्षों से मज़हब की आड़ में कुछ चुनिंदा लोगों के कब्ज़े में रही : मौलाना रकीब
पसमांदा उलेमा बोर्ड के गठन पर ही क्यों दुखने लगता है दिल : अब्दुर रकीब अंसारी
संथाल हूल एक्सप्रेस संवाददाता
जामताड़ा : पसमांदा समाज के वरिष्ठ नेता सह ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश उपाध्यक्ष मौलाना अब्दुर रकीब अंसारी ने मुस्लिम समाज के भीतर दोहरे मापदंड पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि, यह बहुत हैरत की बात है कि जब-जब बड़ी इस्लामी संस्थाएं टूटीं, तब हमेशा कहा गया अल्लाह दोनों जगह से काम ले रहा है, लेकिन जब पसमांदा तबके ने अपने हक की बात की, संगठन बनाया, तो लोगों को तकलीफ़ होने लगी। मौलाना रकीब ने उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि जब दारुल उलूम देवबंद में मतभेद हुआ और वह दो हिस्सों में बंटा, तब भी यही कहा गया कि कोई विवाद नहीं है। जब जमीयत उलेमा हिंद दो भागों में बंटी, तब भी इस पर कोई बड़ा शोर नहीं मचा। इसी तरह मदरसा मजाहिर उलूम का विभाजन हुआ, दावत व तब्लीग का मरकज़ निज़ामुद्दीन भी विवादों में आया, और फिर इमारत-ए-शरिया बिहार-झारखंड-ओडिशा की एकता टूटी मगर हर बार एक ही जुमला दोहराया गया अल्लाह दोनों जगह से काम ले रहा है। उन्होंने आगे कहा, अगर ये जुमला सच है, तो फिर पसमांदा उलेमा बोर्ड के गठन पर ही दिल क्यों दुखने लगता है? अचानक फितना, साज़िश और बगावत जैसे शब्द क्यों इस्तेमाल होने लगते हैं? मौलाना रकीब के मुताबिक मसला धर्म का नहीं है, मसला उस व्यवस्था का है जो वर्षों से मज़हब की आड़ में कुछ चुनिंदा लोगों के कब्ज़े में रही। उन्होंने कहा, हम शरीअत के खिलाफ नहीं हैं, हम मस्जिद के खिलाफ नहीं हैं, हम उलमा के खिलाफ नहीं हैं। हम उस सिस्टम के खिलाफ हैं, जिसने पसमांदा को सिर्फ़ भीड़ बनाकर रखा, कभी क़यादत नहीं दी। मौलाना रकीब ने दो टूक कहा कि पसमांदा आंदोलन किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि इंसाफ और हिस्सेदारी की लड़ाई है। जब तक पसमांदा खामोश था, सब ठीक था, जब पसमांदा जागा, तब फितना पैदा हो गया। ये इंसाफ नहीं, ये डर है हक़ के उठते सवालों से। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज को चाहिए कि वह अब नई सोच को स्वीकार करे, बदलाव से डरे नहीं और पसमांदा समाज को उसका वाजिब हक दे। आज मस्जिद में नमाज़ सबकी है, लेकिन मीमबर पर चढ़ने का हक़ कुछ ख़ास लोगों का क्यों रहा? अब ये दौर बदलने वाला है। मौलाना रकीब ने साफ़ कहा कि,हम तख़्त नहीं चाहते, हम हक़ चाहते हैं। हम टकराव नहीं चाहते, हम बराबरी चाहते हैं। और याद रखिए, हक़ की आवाज़ को दबाया जा सकता है, मगर मिटाया नहीं जा सकता।









