मैं झारखंड हूँ – 25 वसंतों के बाद भी अधूरे सपने, पर अब भी कायम है उम्मीद

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रांची, 15 नवंबर 2025।  आज जब झारखंड अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर रहा है, यह केवल एक उत्सव का दिन नहीं है, बल्कि आत्मावलोकन का क्षण है। एक ऐसा राज्य जो जल, जंगल और जमीन की समृद्ध विरासत लेकर अस्तित्व में आया, आज भी अपनी पूरी क्षमता को पाने के संघर्ष में है।

संसाधनों का खजाना, पर विकास की धीमी रफ्तार

झारखंड की गोद में कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिजों का असीमित भंडार है। यहाँ की नदियाँ, पहाड़ और जंगल प्राकृतिक सौंदर्य और संसाधनों से भरपूर हैं। लेकिन 25 साल बाद भी यह राज्य उस मुकाम तक नहीं पहुँच सका, जिसकी कल्पना इसके गठन के समय की गई थी।

स्वास्थ्य और शिक्षा – दो बड़ी चुनौतियाँ

राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है, जहाँ 70 प्रतिशत महिलाएं एनिमिया से पीड़ित हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हालात चिंताजनक हैं – नए स्कूलों और कॉलेजों के बावजूद संसाधनों, शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की कमी बनी हुई है।

युवाओं का पलायन – सबसे बड़ी विडंबना

रोजगार के अवसरों का अभाव इस राज्य की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। खनिज संपदा से भरपूर होने के बावजूद उद्योगों का पूरी क्षमता से विकास नहीं हो सका, जिसके कारण युवा पीढ़ी रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर है।

फिर भी कायम है उम्मीद

इन सभी चुनौतियों के बावजूद झारखंड की आत्मा में संघर्ष करने की शक्ति बसती है। यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आदिवासी जीवन शैली, लोक कलाएं और नृत्य इस राज्य की पहचान हैं। झारखंड के लोगों में अभी भी उम्मीद की किरण जिंदा है।

आज 25वें साल में खड़ा झारखंड अपने अतीत से सबक लेकर भविष्य की ओर देख रहा है। इसके लिए जरूरी है – बेहतर बुनियादी ढांचा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं, उद्योगों का विकास और रोजगार के नए अवसर। झारखंड की यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है, बल्कि इसका नया अध्याय अब लिखा जाना बाकी है।

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