झारखंड स्थापना दिवस: संघर्ष, संस्कृति और स्वाभिमान की धरती का गौरवमय उत्सव

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संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क

15 नवंबर, झारखंड के इतिहास में किसी पर्व से कम नहीं। यह दिन न केवल झारखंड राज्य गठन की वर्षगांठ है, बल्कि महान क्रांतिकारी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती भी है। उनकी कर्मभूमि और संघर्ष की तपोभूमि पर स्थापित यह राज्य आज अपनी विशिष्ट पहचान, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और वीरता के इतिहास के लिए जाना जाता है।

साल 2000 में लंबे जनांदोलन, संघर्षों और आदिवासी-अनादिवासी समुदायों की संयुक्त आवाज़ के बाद झारखंड एक अलग राज्य बना। यह स्थापना वर्षों की पीड़ा, उम्मीद और संघर्ष का परिणाम थी। जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के लिए यह दिन आत्मसम्मान और अधिकारों की प्राप्ति का प्रतीक है।

झारखंड अपनी प्राकृतिक संपदाओं, घने वनों, विशाल खनिज भंडार, झरनों, त्योहारों और बहुरंगी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए विख्यात है। देवादि देव बाबाधाम, पारसनाथ, नेतरहाट, हिरण्य भैरव, हुंडरू, दशम झरना, सरंडा के जंगल और अनगिनत सांस्कृतिक धरोहरें इस राज्य की अनूठी छवि को और मजबूती देती हैं।

स्थापना दिवस के अवसर पर प्रदेशभर में विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है—

शहीदों और आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि

सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ

आदिवासी-जनजातीय नृत्य

परंपरागत खेल

विकास योजनाओं का शुभारंभ

सरकारी समारोह और जनसभाएँ

राज्य सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रम बिरसा मुंडा के विचारों और संघर्ष की याद दिलाते हैं। भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान—अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ—आज भी राज्य के हर नागरिक के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

झारखंड स्थापना दिवस केवल एक औपचारिक समारोह नहीं, यह झारखंडी अस्मिता, धरोहर और आत्मगौरव का उत्सव है।
संथाल हूल एक्सप्रेस राज्य के सभी नागरिकों को झारखंड स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता है और राज्य की उन्नति, शांति और समृद्धि की कामना करता है।

Bishwjit Tiwari
Author: Bishwjit Tiwari

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