झारखण्ड विधानसभा की पर्यावरण समिति के सभापति के सम्मुख उठाया मुद्दा
संथाल हूल एक्सप्रेस संवाददाता
हजारीबाग : कटकमदाग प्रखंड के बेस पंचायत के पूर्व मुखिया प्रत्याशी एवं जनआंदोलन से जुड़े नेता विक्की कुमार धान ने शनिवार को झारखण्ड विधानसभा की पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण समिति के सभापति उदय शंकर सिंह से हजारीबाग परिसदन भवन में शिष्टाचार मुलाकात कर हजारीबाग जिले के कटकमदाग प्रखंड अंतर्गत बेस पंचायत में फैले गंभीर औद्योगिक प्रदूषण, श्रमिक शोषण और प्रशासनिक उदासीनता का मुद्दा पूरे दमखम के साथ उठाया। विक्की कुमार धान ने कहा कि नरसिम्हा आयरन स्पंज प्लांट, जगतारिणी स्पंज प्लांट, हिंदुस्तान पोल फैक्ट्री और झारखण्ड सेल्स फैक्ट्री ने मिलकर पूरे क्षेत्र को औद्योगिक ज़ोन नहीं बल्कि जहरीला ज़ोन बना दिया है। वायु में घुले धूल-कण और जहरीली गैसें, खुले में फेंका जा रहा औद्योगिक कचरा और दूषित जल स्रोतों ने आम ग्रामीणों के जीवन को नर्क बना दिया है।उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि पंचायत के लोग दमा, टीबी, त्वचा रोग, आँखों की बीमारियों और अन्य गंभीर रोगों से जूझ रहे हैं। खेतों की उर्वरता नष्ट हो चुकी है, पशुधन मर रहा है और पीने का पानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बन चुका है। यह केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पर्यावरणीय अपराध है। जबकि रोज़गार के मुद्दों पर ध्यान आकृष्ट करते हुए धान ने कहा कि उद्योग प्रबंधन ने स्थानीय मेहनतकशों के साथ खुला विश्वासघात किया है। वर्षों से काम कर रहे स्थानीय श्रमिकों को हटाकर बाहरी राज्यों से मजदूर लाए जा रहे हैं, जो स्थानीय नियोजन नीति और श्रम कानूनों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने विशेष रूप से नरसिम्हा आयरन स्पंज प्लांट का उल्लेख करते हुए बताया कि 2019 से लगातार कार्यरत स्थानीय मजदूरों को 2024 में मशीनों का बहाना बनाकर बाहर कर दिया गया। धान ने सभापति से स्पष्ट शब्दों में माँग की कि बेस पंचायत क्षेत्र में संचालित सभी उद्योगों की संयुक्त उच्चस्तरीय जाँच कराई जाए, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर भारी आर्थिक दंड और उत्पादन पर रोक लगाई जाए, अवैध रूप से हटाए गए सभी स्थानीय श्रमिकों का तत्काल पुनर्नियोजन हो और प्रभावित क्षेत्र को स्वास्थ्य आपदा क्षेत्र घोषित किया जाए। वहीं सभापति उदय शंकर सिंह ने मामले को गंभीर बताते हुए समिति स्तर पर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया। वहीं धान ने कहा कि यदि प्रशासन ने शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए तो जनता को मजबूरन राष्ट्रीय हरित अधिकरण और न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी उद्योग प्रबंधन और प्रशासन की होगी।









