संथाल हूल एक्सप्रेस डिजिटल डेस्क
नई दिल्ली। दुनिया में विविधताओं से भरे कई गांव हैं, लेकिन भारत–भूटान सीमा पर स्थित ‘आमार गांव’ अपनी अनोखी पहचान के कारण विशेष चर्चा में है। इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां रहने वाले लगभग सभी लोगों का कद चार फीट से कम है। अलग-अलग जगहों से आए छोटे कद के लोग अब यहां एक परिवार की तरह रह रहे हैं और सामान्य, सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, 2011 में एक कलाकार द्वारा इस गांव की नींव रखी गई थी। उद्देश्य था उन लोगों को एक सुरक्षित ठिकाना देना, जिन्हें अपने कद के कारण समाज में उपेक्षा, भेदभाव या पारिवारिक अस्वीकार का सामना करना पड़ा। गांव में कई ऐसे लोग हैं जो अपनी मर्जी से यहां आए, जबकि कुछ को उनके परिजनों ने सामाजिक दबाव या असहजता के कारण छोड़ दिया था।
आमार गांव में रहने वाले लोग खेती-बाड़ी, हस्तशिल्प और छोटे-छोटे कामों के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं। यहां का माहौल आपसी सहयोग और सम्मान पर आधारित है। ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव ने उन्हें पहचान, आत्मसम्मान और सुरक्षित जीवन दिया है, जो उन्हें पहले समाज में नहीं मिल पाया था।
बताया जाता है कि इस गांव की स्थापना में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से जुड़े कलाकार पवित्र सभा की अहम भूमिका रही है। गांव के निवासी उन्हें अपना सरदार और मार्गदर्शक मानते हैं। उनके प्रयासों से यह बस्ती सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग बन गई है, जो समावेशन और मानवीय संवेदना का उदाहरण पेश करती है।
आमार गांव आज समाज के लिए एक संदेश है कि शारीरिक भिन्नता किसी की योग्यता या सम्मान को कम नहीं करती। यह गांव दिखाता है कि अगर अवसर और सहयोग मिले, तो हर व्यक्ति गरिमापूर्ण जीवन जी सकता है।









