नई दिल्ली। देश में 70 घंटे काम करने की बहस जारी है, वहीं कर्मचारियों के वर्क-लाइफ बैलेंस को ध्यान में रखते हुए लोकसभा में एक महत्वपूर्ण निजी सदस्य विधेयक पेश किया गया है। एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले द्वारा पेश किए गए ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025’ में यह मांग रखी गई है कि कर्मचारी ऑफिस समय के बाद तथा अवकाश के दिनों में बॉस के कॉल या काम से संबंधित मेल का जवाब देने के लिए बाध्य न हों।
यह बिल कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण (Employee Welfare Authority) बनाने का प्रस्ताव रखता है, जिसके तहत हर कर्मचारी को यह अधिकार मिलेगा कि वह निर्धारित कार्य समय के बाद किसी कार्य-संबंधित कॉल, ईमेल या मैसेज का उत्तर न दे। खास बात यह है कि नॉन-कम्प्लायंस की स्थिति में संबंधित कंपनी/संस्थान पर कुल पारिश्रमिक का 1 प्रतिशत जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान भी बिल में शामिल है।
GenZ जहां ‘Me Time’, ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ और ‘मेंटल हेल्थ’ की वकालत कर रहा है, वहीं इस बिल ने देशभर में कामगारों के अधिकारों पर नई चर्चा छेड़ दी है। लोकसभा में पेश यह निजी सदस्य विधेयक मंजूरी के बाद देश के कार्यस्थलों में बड़ा बदलाव ला सकता है। हालांकि अधिकांश प्राइवेट मेंबर बिल चर्चा के बाद वापस ले लिए जाते हैं, लेकिन इस मुद्दे ने आधुनिक कार्यसंस्कृति में अधिकार और जिम्मेदारी दोनों पर नई बहस को जन्म दे दिया है।
कर्मचारियों के लिए यह बिल एक बड़ी राहत साबित हो सकता है—अब सवाल है कि क्या सरकार इसे कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ती है?









