घाटशिला उपचुनाव: भाजपा की योजना फेल, JMM ने बनाई बढ़त, हार के सवालों के घेरे में पार्टी की रणनीति

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धनबाद। घाटशिला विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टा (भाजपा) को मिली शिकस्त ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस हार ने न सिर्फ पार्टी के प्रदेश नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उसकी चुनावी रणनीति और जमीनी संगठन की कमजोरियों को भी बेनकाब कर दिया है।

स्टार प्रचारकों के बावजूद नहीं जमी पकड़

भाजपा ने इस उपचुनाव को जीतने के लिए भारी भरकम ताकत झोंक दी थी। पार्टी ने लगभग 40 स्टार प्रचारकों को चुनाव प्रचार में उतारा, जिनमें पांच पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल थे। हेलीकॉप्टर से होने वाले इस विस्तृत प्रचार अभियान के बावजूद, पार्टी जमीनी स्तर पर मतदाताओं का भरोसा हासिल करने में नाकाम रही। माना जा रहा है कि पार्टी का जन आधार सक्रिय नहीं हो पाया और कार्यकर्ता चुनावी मैदान में प्रभावी भूमिका नहीं निभा सके।

स्थानीय नेताओं को नजरअंदाज करना पड़ा भारी

चुनाव परिणाम के बाद उभरकर आई मुख्य वजहों में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को किनारे करना बताया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदेश नेतृत्व ने पूरी कमान अपने हाथों में ले ली थी, जिससे स्थानीय नेता नाराजगी महसूस कर रहे थे। इन नेताओं के इलाके के समीकरणों और मतदाताओं के स्वभाव की गहरी समझ के अभाव में पार्टी की रणनीति धरी की धरी रह गई। इसका नतीजा यह हुआ कि बूथ स्तर पर संगठन कमजोर पड़ गया।

चंपई सोरेन की रणनीति भी रही असफल

भाजपा के विधायक चंपई सोरेन ने अपनी रणनीति में जनजातीय इलाकों पर फोकस किया था और उम्मीद जताई थी कि इस समुदाय का समर्थन उन्हें मिलेगा। हालांकि, नतीजे ने उनकी इस उम्मीद को भी ध्वस्त कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में, जब चंपई सोरेन अपनी सीट पर अधिक समय दे रहे थे और प्रदेश नेतृत्व अन्यत्र व्यस्त था, तब भाजपा के उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन को 75,000 वोट मिले थे और हार का अंतर केवल 22,000 वोटों का था। इस बार, अधिक संसाधन और समय लगाने के बावजूद, पार्टी को पिछले चुनाव से भी कम वोट मिले और हार का अंतर बढ़कर 38,000 से अधिक हो गया।

अब हार की जिम्मेदारी तय करने की बारी

इस हार के बाद अब पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इस नतीजे की जिम्मेदारी किसे दी जाए? क्या इसे उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन की निजी हार माना जाए, या फिर चंपई सोरेन की रणनीति की विफलता? या फिर प्रदेश नेतृत्व की केंद्रीकृत और स्थानीय नेताओं से दूर चलाई गई कमान इसके लिए जिम्मेदार है? यह सवाल अब पार्टी की आंतरिक जांच और आगामी रणनीति का केंद्र बिंदु बन गए हैं।

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