कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला गोपालाष्टमी हिन्दू धर्म में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के गोपाल स्वरूप की उपासना का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन नंद बाबा के घर श्रीकृष्ण ने पहली बार गायों को चराने हेतु गोचर किया था।
इसलिए इस दिन श्रीकृष्ण और गौमाता दोनों की विशेष पूजा की जाती है तथा गोवंश की सेवा कर पुण्य लाभ प्राप्त किया जाता है।
क्यों मनाते हैं गोपालाष्टमी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार —
✅ यह दिन गायों के प्रति प्रेम, संरक्षण और संवर्धन का संदेश देता है।
✅ गाय को माता के समान मानकर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
✅ कृषि आधारित भारतीय संस्कृति में गाय को समृद्धि का स्रोत माना गया है।
शास्त्रों में भी गौसेवा को महान धर्म बताया गया है।
गोपालाष्टमी के प्रमुख अनुष्ठान
📌 गौशालाओं और घरों में गायों का स्नान एवं श्रृंगार
📌 गोमाता के सींगों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाना
📌 गाय को हरी घास, गुड़, चारा आदि खिलाना
📌 मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना एवं भजन-कीर्तन
📌 गौसेवा और दान का आयोजन
ग्रामीण क्षेत्रों में गायों के साथ शोभायात्रा निकालने की भी परंपरा है।
आस्था से लेकर अर्थव्यवस्था तक — गाय का महत्व
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय आज भी मजबूती का आधार है —
✅ दुग्ध उत्पादन
✅ प्राकृतिक खाद और खेती
✅ ग्रामीण आजीविका का स्रोत
इसलिए यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
संथाल परगना में भी उमंग के साथ मनाया जा रहा पर्व
साहिबगंज, पाकुड़, जामताड़ा, दुमका, देवघर सहित संथाल परगना के विभिन्न इलाकों में
गौशालाओं, मंदिरों और घरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दे रही है।
लोग भगवान श्रीकृष्ण का जैकारा लगाते हुए गौसेवा में जुटे हैं।
“गाय हमारी संस्कृति और कृषि का आधार है —
गोपालाष्टमी हमें इस धरोहर की रक्षा और सेवा का संकल्प दिलाती है।”
📌 रिपोर्ट: संथाल हूल एक्सप्रेस (हिंदी दैनिक)
📍 झारखंड









