मिडिल ईस्ट संकट का असर: 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंची थोक महंगाई, आम आदमी पर बढ़ा बोझ

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नई दिल्ली : मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। अप्रैल 2026 में देश की थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो पिछले 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। इससे पहले मार्च 2026 में यह दर 3.88 प्रतिशत थी, जबकि अप्रैल 2025 में महंगाई दर महज 0.85 प्रतिशत दर्ज की गई थी।

विशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल, सोना और खाद्य उत्पादों की कीमतों में तेजी ने भारतीय बाजार को सीधे प्रभावित किया है। खासकर मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक संकट के कारण ईंधन की लागत बढ़ी है, जिसका असर परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा है।

सोना, दूध और सीएनजी ने बढ़ाई चिंता

देशभर में सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। शादी-ब्याह के सीजन में सोने के दाम बढ़ने से उपभोक्ताओं की परेशानी और बढ़ गई है। वहीं दूध के दामों में वृद्धि ने घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।

मुंबई में सीएनजी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने आम यात्रियों और परिवहन क्षेत्र को प्रभावित किया है। ऑटो, टैक्सी और सार्वजनिक परिवहन का खर्च बढ़ने से इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।

आम आदमी पर ‘ट्रिपल अटैक’

महंगाई के इस दौर को लोग “ट्रिपल अटैक” के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि ईंधन, खाद्य सामग्री और कीमती धातुओं — तीनों क्षेत्रों में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों के मासिक बजट पर इसका सीधा असर दिखाई दे रहा है। रसोई गैस, दूध, सब्जियां और परिवहन खर्च बढ़ने से लोगों की बचत प्रभावित हो रही है।

सरकार और अर्थशास्त्रियों की नजर

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि वैश्विक संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई भी और बढ़ सकती है। वहीं सरकार हालात पर नजर बनाए हुए है और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न आर्थिक उपायों पर विचार कर रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक हालात सामान्य होने तक भारतीय बाजार में कीमतों का दबाव बना रह सकता है, जिससे आम लोगों को फिलहाल राहत मिलने की उम्मीद कम दिखाई दे रही है।

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