झारखंड के दुमका जिले के युवा वैज्ञानिक डॉ. कुमार मृत्युंजय ने तंत्रिका विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल कर देश और राज्य का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित प्रिंसटन विश्वविद्यालय में शोधोत्तर शोधकर्ता के रूप में कार्यरत डॉ. मृत्युंजय और उनकी टीम ने एक अत्याधुनिक उपकरण विकसित किया है, जिसे तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, इस उपकरण की सहायता से त्रिआयामी तंत्रिका संवर्धन को छह महीने से अधिक समय तक रिकॉर्ड और नियंत्रित किया जा सकता है। इस नई तकनीक के जरिए वैज्ञानिक यह समझने में सफल हो रहे हैं कि बाहरी उद्दीपन के दौरान तंत्रिका परिपथ किस प्रकार विकसित होते हैं। शोध में यह भी सामने आया है कि न्यूरॉन्स को पैटर्न पहचान जैसे संगणकीय कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है और निरंतर प्रशिक्षण से उनकी क्षमता और बेहतर होती जाती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में मस्तिष्क प्रेरित संगणना और तंत्रिका संबंधी बीमारियों के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। डॉ. मृत्युंजय का यह शोध विश्व के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक शोध पत्रिका नेचर में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने बताया कि यह तकनीक भविष्य में त्रिआयामी मस्तिष्क अनुसंधान और दवाओं के न्यूरॉन्स पर पड़ने वाले प्रभाव को वास्तविक समय में समझने में काफी मददगार साबित होगी।
डॉ. कुमार मृत्युंजय ने कहा कि उनका उद्देश्य ऐसा मंच विकसित करना है, जिससे मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को बेहतर तरीके से समझा जा सके। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में यह तकनीक तंत्रिका संबंधी बीमारियों के उपचार और मस्तिष्क प्रेरित संगणना को नई दिशा दे सकती है।
दुमका के इस प्रतिभाशाली बेटे की प्रारंभिक शिक्षा दुमका में हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल बोकारो से बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की और फिर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर से बीटेक किया। बाद में उन्होंने प्रिंसटन विश्वविद्यालय से विद्युत एवं संगणक अभियांत्रिकी और तंत्रिका विज्ञान में दोहरी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. मृत्युंजय के पिता पुरुषोत्तम भगत दुमका न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, जबकि उनकी माता किरण कुमारी सरकारी विद्यालय में शिक्षिका हैं। बेटे की इस उपलब्धि पर परिवार ने खुशी जताते हुए कहा कि भारत सरकार को देश के वैज्ञानिकों को बेहतर अनुसंधान सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि वे देश में रहकर भी विश्वस्तरीय अनुसंधान कर सकें।
पिता पुरुषोत्तम भगत ने कहा कि ऐसे युवा वैज्ञानिक देश के लिए रत्न हैं। यदि भारत में भी अमेरिका जैसी शोध सुविधाएं उपलब्ध हों, तो हमारे वैज्ञानिक देश में रहकर ही दुनिया में भारत का नाम रोशन कर सकते हैं।
दुमका के इस बेटे की सफलता आज पूरे झारखंड और देश के लिए गर्व का विषय बन गई है। विदेश में रहकर अत्याधुनिक अनुसंधान के जरिए डॉ. कुमार मृत्युंजय वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं।









