संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क।
हर वर्ष 5 नवंबर को विश्व भर में विश्व सुनामी जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को सुनामी जैसी समुद्री आपदा के प्रति जागरूक करना और समय रहते बचाव के उपायों की जानकारी देना है। महासागरों के किनारे बसे देशों में सुनामी का खतरा हमेशा बना रहता है और थोड़ी सी लापरवाही भी भारी विनाश का कारण बन सकती है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की शुरुआत 2015 में की थी, ताकि पूरी दुनिया में सुनामी से निपटने की तैयारी और सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जा सके।
रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले कुछ दशकों में सुनामी ने लाखों लोगों की जान ली और करोड़ों लोगों को प्रभावित किया है। वर्ष 2004 में हिंद महासागर में आई विनाशकारी सुनामी इसकी सबसे भयावह मिसाल है, जिसमें भारत सहित कई देशों में भारी तबाही हुई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुनामी से होने वाले नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है—
✅ समय पर चेतावनी
✅ सही दिशा में सुरक्षित स्थान पर पलायन
✅ स्थानीय आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण
✅ सामुदायिक जागरूकता
सरकारें और आपदा प्रबंधन एजेंसियां लगातार तकनीकी प्रणालियों को मजबूत कर रही हैं, जिससे भूकंप या समुद्री हलचल के तुरंत बाद चेतावनी जारी की जा सके।
स्कूलों और तटीय क्षेत्रों में भी मॉक ड्रिल एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि आपदा के समय घबराहट के बजाय समझदारी से कदम उठाए जा सकें।
झारखंड भले ही समुद्र तट से दूर है, लेकिन आपदा प्रबंधन की दृष्टि से जागरूकता और प्रशिक्षण हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक आपदाएँ भौगोलिक सीमाओं को नहीं देखतीं।
विश्व सुनामी जागरूकता दिवस हमें यह संदेश देता है कि—
“प्रकृति को रोकना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखना पूरी तरह हमारी जिम्मेदारी है।”
संथाल हूल एक्सप्रेस (हिंदी दैनिक), झारखंड









