दिशोम गुरु शिबू सोरेन: संघर्ष से सत्ता तक का सफर, पहली पुण्यतिथि पर उनकी राजनीतिक विरासत

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संथाल हूल एक्सप्रेस डेस्क

झारखंड की राजनीति में यदि किसी एक नेता ने जनआंदोलन को सत्ता तक पहुंचाने का सबसे बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया, तो वह नाम है दिशोम गुरु शिबू सोरेन। अलग झारखंड राज्य के आंदोलन से लेकर राज्य की सत्ता और राष्ट्रीय राजनीति तक उनका सफर संघर्ष, नेतृत्व और जनविश्वास की मिसाल रहा। पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है।

आंदोलन की धरती से उभरा एक जननायक

11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने महज 18 वर्ष की उम्र में 1962 में संताल नवयुवक संघ की स्थापना की। 1970 के दशक में उन्होंने आदिवासियों की जमीन, जल, जंगल और अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया। साहूकारी, जमीन कब्जा और सामाजिक शोषण के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें आदिवासी समाज में “दिशोम गुरु” की पहचान दिलाई।

झामुमो को दिया मजबूत राजनीतिक आधार

वर्ष 1972 में बिनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की नींव रखी। 2 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में आयोजित ऐतिहासिक सभा में झामुमो का औपचारिक गठन हुआ। बिनोद बिहारी महतो अध्यक्ष बने, जबकि शिबू सोरेन पहले महासचिव चुने गए।

1986 में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने करीब 38 वर्षों तक संगठन का नेतृत्व किया और झामुमो को एक क्षेत्रीय आंदोलन से राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली पहचान दिलाई। निधन तक वे पार्टी के मुख्य संरक्षक रहे।

चुनावी राजनीति में कई उतार-चढ़ाव

शिबू सोरेन ने 1977 में टुंडी विधानसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा पहुंचे और बाद के वर्षों में दुमका से आठ बार सांसद चुने गए। वे चार बार राज्यसभा सदस्य भी रहे।

उन्होंने चुनावी हार भी देखी, लेकिन हर बार जनता के बीच लौटकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की और झामुमो को लगातार विस्तार दिया।

तीन बार बने झारखंड के मुख्यमंत्री

15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य के गठन के बाद शिबू सोरेन तीन बार मुख्यमंत्री बने।

  • पहली बार: 2 मार्च 2005 से 11 मार्च 2005
  • दूसरी बार: 27 अगस्त 2008 से जनवरी 2009
  • तीसरी बार: 30 दिसंबर 2009 से 31 मई 2010

हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने झारखंड की राजनीति में अपनी मजबूत छाप छोड़ी।

केंद्र सरकार में भी निभाई अहम जिम्मेदारी

शिबू सोरेन भारत सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री भी रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में आदिवासियों के अधिकार, स्थानीय नीति, जल-जंगल-जमीन और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार प्रमुखता दी।

संघर्ष ही रही उनकी सबसे बड़ी पहचान

उनकी “जंगल काटो, खेत जोतो” जैसी रणनीतियां आदिवासी आंदोलनों की पहचान बनीं। उन्होंने हमेशा स्थानीय लोगों के अधिकार, शिक्षा, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों पर उनके हक की आवाज बुलंद की।

उनके राजनीतिक जीवन में कई विवाद भी आए, लेकिन उन्होंने अपने मूल मुद्दों—आदिवासी अधिकार, सामाजिक न्याय और झारखंड की पहचान—को कभी नहीं छोड़ा।

झारखंड की राजनीति में अमिट विरासत

2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में लगातार दूसरी बार सरकार बनी। यह सफलता उस संगठनात्मक नींव का परिणाम मानी जाती है, जिसे दशकों पहले दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने संघर्ष और नेतृत्व से मजबूत किया था।

आज भी झारखंड के लाखों लोग शिबू सोरेन को केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि जनआंदोलन के प्रतीक, आदिवासी अस्मिता की आवाज और “दिशोम गुरु” के रूप में श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं। उनकी राजनीतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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