धरती आबा बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कोकर समाधि स्थल पर अर्पित की श्रद्धांजलि

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संथाल हूल एक्सप्रेस संवाददाता

रांची:झारखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी समाज के मसीहा धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर आज पूरे राज्य में श्रद्धा और सम्मान के साथ उन्हें याद किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राजधानी रांची के कोकर स्थित बिरसा मुंडा समाधि स्थल पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

मुख्यमंत्री ने समाधि स्थल पर स्थित भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। उन्होंने कुछ समय वहां मौन धारण कर भगवान बिरसा मुंडा के त्याग, बलिदान और संघर्ष को याद किया। इस दौरान उनके साथ कई मंत्री, विधायक, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि और आमजन भी मौजूद रहे।

भगवान बिरसा मुंडा की विचारधारा आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक है- मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस अवसर पर कहा,धरती आबा बिरसा मुंडा ने सिर्फ आदिवासी समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। वे युवाओं के लिए एक प्रेरणा हैं। उनकी विचारधारा आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक है। राज्य सरकार उनके सपनों का झारखंड बनाने के लिए कृतसंकल्प है।उन्होंने आगे कहा कि बिरसा मुंडा के बताए रास्ते पर चलकर ही राज्य को सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार भगवान बिरसा मुंडा की स्मृतियों को सहेजने और भावी पीढ़ी तक उनके योगदान को पहुँचाने के लिए कई योजनाओं और कार्यक्रमों पर काम कर रही है।

राज्य भर में हुए श्रद्धांजलि कार्यक्रम

राजधानी रांची के साथ-साथ झारखंड के विभिन्न जिलों में भी धरती आबा की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों और पदयात्राओं का आयोजन किया गया। विद्यालयों और कॉलेजों में भगवान बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित भाषण, निबंध प्रतियोगिता और चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।

कौन थे भगवान बिरसा मुंडा?

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के उलिहातू गांव में हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ “उलगुलान” (विद्रोह) का नेतृत्व किया और आदिवासी समाज के अधिकारों, संस्कृति और पहचान के लिए संघर्ष किया। महज 25 वर्ष की उम्र में 9 जून 1900 को उन्होंने अंग्रेजों की जेल में अंतिम सांस ली। उनकी शहादत आज भी झारखंड और देश के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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