इन दिनों देश में भगवान हनुमान से जुड़े अलग-अलग प्रसंग चर्चा में हैं। एक ओर ‘हनुमान अंश’ फिल्म दर्शकों के बीच आध्यात्मिक विषय को लेकर चर्चा में है, दूसरी ओर उज्जैन में खड़े हनुमान जी की प्रतिमा को हटाने को लेकर प्रशासन और संत समाज के बीच विवाद सामने आया। अब जम्मू के महेशपुरा इलाके में पेड़ के तने पर हनुमान जी जैसी आकृति दिखाई देने का दावा भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।
सिनेमा में हनुमान अंश की चर्चा
भगवान हनुमान और संत नीम करौली बाबा के आध्यात्मिक जीवन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ 2026 में रिलीज हुई और लंबे समय तक सिनेमाघरों में दर्शकों की रुचि का विषय बनी रही। उपलब्ध बॉक्स ऑफिस रिपोर्टों के अनुसार फिल्म ने वैश्विक स्तर पर ₹350 करोड़ से अधिक का कारोबार किया है।

फिल्म के आधिकारिक प्रचार में भी नीम करौली बाबा के जीवन, सेवा, भक्ति और हनुमान से जुड़ी आध्यात्मिक मान्यताओं को प्रमुखता दी गई है।
उज्जैन में प्रतिमा को लेकर उठा सवाल
इसी बीच मध्य प्रदेश के उज्जैन में खड़े हनुमान जी की प्रतिमा को स्थानांतरित करने को लेकर विवाद सामने आया। प्रशासन की ओर से सिंहस्थ की तैयारियों के संदर्भ में प्रतिमा के विस्थापन की प्रक्रिया की बात सामने आई थी, जिसका संत समाज और स्थानीय लोगों के एक वर्ग ने विरोध किया।
विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन ने प्रक्रिया रोकते हुए विशेषज्ञों की जांच तथा संत समाज और स्थानीय प्रतिनिधियों की सहमति के बाद आगे निर्णय लेने की बात कही।
प्रतिमा के बारे में सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया कि उसे हटाने का प्रयास किया गया लेकिन वह नहीं हिली। हालांकि उज्जैन के एसडीएम ने इस दावे को स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रशासन ने प्रतिमा हटाने का प्रयास किया ही नहीं था।
यानी यहां आस्था से जुड़े दावों और प्रशासन के आधिकारिक बयान में अंतर भी सामने आया है।
अब जम्मू के पेड़ में दिखा ‘हनुमान रूप’

जम्मू के महेशपुरा इलाके में एक पेड़ का तना भी इन दिनों लोगों की चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, करीब डेढ़ महीने पहले एक ऑटो चालक ने पेड़ को पानी देते समय उसकी छाल में हनुमान जी के चेहरे और गदा जैसी आकृति देखी। इसके बाद तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल गईं और वहां श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया।
स्थानीय स्तर पर यह दावा भी किया जा रहा है कि आकृति सबसे पहले देखने वाले ऑटो चालक को बाद में सरकारी नौकरी मिली और कुछ लोग इसे हनुमान जी की कृपा से जोड़कर देख रहे हैं। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्राकृतिक आकृतियों में चेहरा या परिचित आकार दिखाई देना ‘पेरिडोलिया’ नामक मानवीय धारणा से समझाया जा सकता है। फिलहाल इस पेड़ की आकृति को लेकर कोई वैज्ञानिक जांच सामने नहीं आई है।
आस्था, विश्वास और प्रमाण—तीनों के बीच सवाल
इन तीनों घटनाओं को एक साथ देखें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है—सिनेमा में आध्यात्मिक कथा, उज्जैन में प्रतिमा को लेकर आस्था और प्रशासन का टकराव, तथा जम्मू में प्राकृतिक आकृति को लेकर लोगों की धार्मिक भावनाएं।
आस्था व्यक्तिगत और सामाजिक विश्वास का विषय है, जबकि किसी घटना के चमत्कारिक होने का वैज्ञानिक निष्कर्ष अलग विषय है। इसलिए ऐसे मामलों में श्रद्धा का सम्मान करते हुए दावों, आधिकारिक बयानों और वैज्ञानिक जांच को अलग-अलग समझना जरूरी है।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि हनुमान से जुड़े इन तीन अलग-अलग प्रसंगों ने देश में भक्ति, आस्था, परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच संवाद की एक नई जमीन तैयार कर दी है।










